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अभिनेता श्रुहद गोस्वामी, करण जोशी और निर्देशक अंकित सखिया ने नवाबों के शहर में बिताए यादगार पल,

'लालो – कृष्ण सदा सहायते’ ने लखनऊ में दर्ज की शानदार मौजूदगी

‘लालो – कृष्ण सदा सहायते’ ने लखनऊ में दर्ज की शानदार मौजूदगी

अभिनेता श्रुहद गोस्वामी, करण जोशी और निर्देशक अंकित सखिया ने नवाबों के शहर में बिताए यादगार पल,

लखनऊ, 15 जनवरी 2026:
जब अतीत के बोझ से दबा एक व्यक्ति आस्था में अपना मार्गदर्शक पाता है, तब जन्म लेती है एक असाधारण कहानी। गुजराती बॉक्स ऑफिस पर ऐतिहासिक और अभूतपूर्व सफलता दर्ज करने के बाद लालो – कृष्णा सदा सहायते
अब देशभर में हिंदी दर्शकों के बीच अपनी छाप छोड़ रही है। इसी कड़ी में फिल्म के अभिनेता श्रुहद गोस्वामी, करन जोशी निर्देशक अंकित सखिया फिल्म के प्रचार के लिए नवाबों के शहर लखनऊ पहुँचे।

यह फिल्म मैनिफेस्ट फिल्म्स द्वारा प्रस्तुत की गई है इसके निर्माता हैं पडारिया और जय व्यास साथ ही फ़िल्म में कलाकार के रूप में, रीवा रच्छ, श्रुहद गोस्वामी, करण जोशी, निर्देशक अंकित सखिया मौजूद हैं.

लखनऊ प्रवास के दौरान कलाकारों ने शहर की मशहूर लखनवी चाट और चाय का स्वाद लिया तथा वेव मॉल में प्रशंसकों से मुलाकात की। प्रशंसकों के उत्साह और प्रेम से अभिभूत कलाकारों ने इस अनुभव को बेहद खास बताया।

श्रुहद गोस्वामी ने कहा,
“लखनऊ ने तो मेरा दिल जीत लिया है—यहाँ की गर्मजोशी, स्वादिष्ट चाट और अनगिनत कप चाय। वेव मॉल में हमारे प्रशंसकों से मिलना बेहद खास रहा, जिन्होंने पूरे दिल से हमारी फिल्म देखी और अपार प्रेम दिया।”

करण जोशी ने कहा,
“लखनऊ की मेहमाननवाज़ी बेमिसाल है—खाने से लेकर लोगों तक, सब कुछ अपनापन देता है। वेव मॉल में दर्शकों से मिला प्यार अविस्मरणीय है। मैं फिर यहाँ आने के लिए उत्सुक हूँ।”

निर्देशक अंकित सखिया ने कहा,
“लखनऊ ने हमें खुले दिल से अपनाया—शानदार भोजन, अद्भुत अपनापन और ढेर सारा स्नेह। वेव मॉल में दर्शकों को फिल्म से जुड़ते देखना हमारे इस सफर को और भी सार्थक बना गया।”

फिल्म के बारे में
‘लालो – कृष्ण सदा सहायते’ की आत्मा है लालो—एक साधारण पारिवारिक व्यक्ति और रिक्शा चालक, जो जीवन की कठिनाइयों और अपने अतीत की छाया से जूझ रहा है। परिस्थितियाँ उसके नियंत्रण से बाहर जाती दिखती हैं और उसका संसार भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर बिखरने लगता है। तभी जीवन एक अप्रत्याशित मोड़ लेता है, जब उसका सामना दैवीय शक्ति से होता है।
इसके बाद शुरू होती है आस्था, भय, अंतर्द्वंद्व और आशा की सशक्त यात्रा—जो उसके विश्वासों को चुनौती देती है और उसे आत्मिक रूप से परिवर्तित करती है। यथार्थ से जुड़ी और गहराई से आध्यात्मिक यह फिल्म दर्शकों को लालो के मन और आत्मा की यात्रा में सहभागी बनाती है, जहाँ खोज अंत तक जारी रहती है।

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