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मुख्यमंत्री ने वाराणसी में ‘डायरेक्ट सीडेड राइस कॉन्क्लेव’ को सम्बोधित किया

धान की सीधी बुआई, जीरो टिलेज गेहूं एवं समृद्धि धान नेटवर्क पर आधारित प्रकाशन सामग्री का विमोचन

मुख्यमंत्री ने वाराणसी में ‘डायरेक्ट सीडेड राइस कॉन्क्लेव’ को सम्बोधित किया

मुख्यमंत्री ने कृषि ज्ञान उत्पादों और मशीनरी नवाचारों की एक श्रृंखला का
अनावरण, किसानों को बीज के निःशुल्क मिनी किट का वितरण किया

धान की सीधी बुआई, जीरो टिलेज गेहूं एवं समृद्धि धान
नेटवर्क पर आधारित प्रकाशन सामग्री का विमोचन

विगत 11 वर्षों में देश में कृषि के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए, प्रधानमंत्री
जी ने देश में स्वॉयल हेल्थ कार्ड अनिवार्य किया और किसानों को
कृषि बीमा, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई जैसी योजनाओं से जोड़ा : मुख्यमंत्री

हमारे पास प्रदेश को देश के फूड बास्केट के रूप में
आगे बढ़ाने के लिए अनेक सम्भावनाएं मौजूद

10 करोड़ किसानों को हर वर्ष प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि का लाभ प्राप्त हो रहा

भारत की कुल भूमि का उ0प्र0 में मात्र 11 प्रतिशत, उ0प्र0
इसी भूमि से देश के कुल खाद्यान्न का 21 प्रतिशत उत्पादन करता

प्रदेश में राज्य सरकार द्वारा संचालित चार कृषि विश्वविद्यालय,
भारत सरकार के दो कृषि विश्वविद्यालय, एक निजी कृषि विश्वविद्यालय और 89 कृषि विज्ञान केन्द्र मौजूद

प्रधानमंत्री जी ने वाराणसी में राइस तथा आगरा में पोटैटो के अन्तरराष्ट्रीय
शोध केन्द्र स्वीकृत किये, इण्टरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट का
दक्षिण एशिया केन्द्र, वाराणसी वर्ष 2018 से सफलतापूर्वक कार्य कर रहा

उ0प्र0 में वर्तमान में 80 प्रतिशत से अधिक भूमि सिंचित

प्रदेश में लगभग 70 लाख हेक्टेयर भूमि में धान और
100 लाख हेक्टेयर भूमि में गेहूं की खेती होती

हमारा खेती का रकबा 170 लाख हेक्टेयर से बढ़कर वर्ष 2023-24 में
240 लाख हेक्टेयर हुआ, वर्तमान में 60 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन अकेले उ0प्र0 कर रहा

वर्ष 1950 की तुलना में वर्ष 2023 में खाद्यान्न उत्पादन में पांच गुना की वृद्धि हुई

लखनऊ में पूर्व प्रधानमंत्री स्व0 चौधरी चरण सिंह जी के
नाम पर एक सीड पार्क की स्थापना की जा रही

लखनऊ : 06 अक्टूबर, 2025

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने कहा कि काशी, भगवान विश्वनाथ की पावन नगरी है। भगवान विश्वनाथ का सबसे अभिन्न सहयोगी वृषभ (नंदी) है, जो भारत की उन्नत खेती की ओर हम सबका ध्यान आकर्षित करता है। उत्तर प्रदेश कृषि विभाग की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर उन्नत कृषि के प्रतीक नंदी के आराध्य भगवान विश्वनाथ की पावन धरा काशी में डी0एस0आर0 जैसी तकनीक पर एक महत्वपूर्ण कॉन्क्लेव आयोजित हो रहा है।
मुख्यमंत्री जी आज अन्तरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केन्द्र (आइसार्क), जनपद वाराणसी में कृषि विभाग की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर उत्तर प्रदेश को वर्ष 2030 तक वैश्विक फूड बास्केट बनाने के लिए विचार विमर्श के उद्देश्य से आयोजित ‘डायरेक्ट सीडेड राइस कॉन्क्लेव’ के अवसर पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। मुख्यमंत्री जी ने कृषि ज्ञान उत्पादों और मशीनरी नवाचारों की एक श्रृंखला का अनावरण भी किया। इनमें इरी एवं जे0एन0के0वी0 द्वारा विकसित ई-सीडर एवं प्रिसिजन हिल सीडर शामिल हैं। इस पहल के तहत उन्होंने किसानों को बीज के निःशुल्क मिनी किट भी वितरित किए। मुख्यमंत्री जी ने धान की सीधी बुआई, जीरो टिलेज गेहूं एवं समृद्धि धान नेटवर्क पर आधारित प्रकाशन सामग्री का विमोचन किया।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि खेती-किसानी आज की नई देन नहीं है। भारत के उपनिषद् हजारों वर्षों की ऋषि परम्परा के आध्यात्मिक ज्ञान की एक बड़ी धरोहर है। उपनिषद कहते हैं कि ‘अन्नं बहु कुर्वीत’ अर्थात अन्न को बड़ी मात्रा में पैदा करो। यही हमारा संकल्प होना चाहिए। भारत की ऋषि परम्परा के अनुरूप अच्छी कृषि के लिए तीन बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं। खेती में प्राकृतिक उर्वरता हो, सिंचाई की बेहतर व्यवस्था हो और पर्याप्त मात्रा में धूप हो। भारत की भूमि अत्यन्त उर्वरा है। भौगोलिक दृष्टि से दुनिया में सबसे विशाल क्षेत्रफल रूसी संघ के पास है। फिर कनाडा, अमेरिका, चीन, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया का स्थान है। भारत सातवें स्थान पर है।
दुनिया के कुल भू-भाग में मात्र 10 प्रतिशत भू-भाग ही कृषि योग्य है। भारत में भौगोलिक क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे अधिक कृषि योग्य उर्वरा भूमि है। अकेले भारत के पास 17 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है। अमेरिका क्षेत्रफल में भारत से कई गुना बड़ा है, लेकिन उसके पास भी लगभग इतनी ही कृषि योग्य भूमि है। दुनिया के विभिन्न देशों में सिंचित भूमि बहुत कम है। भारत दुनिया का एक ऐसा देश है जिसकी 60 प्रतिशत भूमि को सिंचाई की बेहतरीन व्यवस्था उपलब्ध है। भारत में प्रकृति प्रदत्त यह सुविधा पहले से ही है। हजारों वर्षों की विरासत के तहत यह सुविधा तैयार की गई है। यही कारण है कि भारत में प्राचीनकाल से ही खाद्यान्न उत्पादन के लिए अन्नदाता किसान और देश के कृषि वैज्ञानिक आग्रही रहे हैं। प्राचीनकाल के भारत के ऋषि, कृषि वैज्ञानिक भी रहे हैं। एग्रीकल्चर, शिक्षा, स्वास्थ्य सहित जीवन के किसी भी क्षेत्र में ज्ञान की धरोहर जिसके भी पास मौजूद है, वही ऋषि है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि उत्तर प्रदेश इस मामले में सबसे अधिक सौभाग्यशाली है कि भारत की कुल भूमि का हमारे पास मात्र 11 प्रतिशत है, भारत की 17 प्रतिशत जनसंख्या अर्थात 25 करोड़ की आबादी इसमें निवास भी करती है। लेकिन उत्तर प्रदेश इसी 11 प्रतिशत भूमि से देश के कुल खाद्यान्न का 21 प्रतिशत उत्पादन करता है। उत्तर प्रदेश ने इस दिशा में आजादी के बाद विगत 75 वर्षों में एक लंबी छलांग लगाई है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि विगत 11 वर्षों में देश में कृषि के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं। हमारे ऋषि कहते रहे हैं कि ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्या’, अर्थात धरती हमारी माता है। हम सब इसके पुत्र हैं। हम खेती-बाड़ी तो करते थे, लेकिन धरती माता के स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखते थे। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने पहली बार देश में स्वॉयल हेल्थ कार्ड अनिवार्य किया और देश के सभी किसानों को कृषि बीमा, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई जैसी योजनाओं से जोड़ा। अन्नदाता किसानों को लागत का डेढ़ गुना एम0एस0पी0 देने की गारण्टी दी। भारत में पहली बार 10 करोड़ किसानों को हर वर्ष प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि का लाभ भी प्राप्त हो रहा है। अकेले भारत ही होगा, जो अपने अन्नदाता किसानों को ऐसी सुविधा देता है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि उत्तर प्रदेश देश की सर्वाधिक आबादी वाला राज्य है। हमारे पास प्रदेश को देश के फूड बास्केट के रूप में आगे बढ़ाने के लिए अनेक सम्भावनाएं मौजूद हैं। इसी प्रदेश में 11 फीसदी भूभाग में हम देश के 21 प्रतिशत खाद्यान्न का उत्पादन करते हैं। इसमें राज्य सरकार द्वारा संचालित चार कृषि विश्वविद्यालय, भारत सरकार के दो कृषि विश्वविद्यालय, एक निजी कृषि विश्वविद्यालय और 89 कृषि विज्ञान केन्द्र अब तक सहयोग कर रहे हैं। वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में वाराणसी में ’इरी’ का सेण्टर खुला। इसने एक बड़ी भूमिका का निर्वहन उत्तर प्रदेश सहित देश के लिए किया है। डॉ0 सुधांशु लगातार राइस की नई वैरायटी तथा क्लाइमेट चेंज के इस दौर में कौन सी वैरायटी उपयोगी हो सकती है, इन सबके बारे में निरन्तर कार्य कर रहे हैं। इसका लाभ उत्तर प्रदेश के हमारे कृषि वैज्ञानिकों के साथ-साथ प्रदेश और देश के कृषि संस्थानों को वर्तमान में प्राप्त हो रहा है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आज उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य है, जिसके पास सर्वाधिक कृषि विश्वविद्यालय भी हैं। पांचवा कृषि विश्वविद्यालय हम बनाने जा रहे हैं। इसके साथ ही, हमारे पास वाराणसी में राइस तथा आगरा में पोटैटो के दो अन्तरराष्ट्रीय शोध केन्द्र भी प्रधानमंत्री जी ने स्वीकृत किये। इण्टरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट का दक्षिण एशिया केन्द्र, वाराणसी वर्ष 2018 से सफलतापूर्वक कार्य कर रहा है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि भारत में संभावनाएं पहले से थीं। पहले केमिकल, फर्टिलाइजर, पेस्टिसाइड का उपयोग भारत में नहीं होता था। कम लागत में अधिक उत्पादन आज की आवश्यकता है। हम इस दिशा में कौन से प्रयास कर सकते हैं। भारत के प्राचीन वैज्ञानिक इसके लिए क्या करते थे। हम आज उसे फिर से किस प्रकार अपना सकते हैं। पहले हम अपने यहां डी0एस0आर0 पद्धति लागू करते थे, क्योंकि इसमें कम पानी लगता है और उत्पादन भी ठीक होता था। जब भी हम इनोवेशन और रिसर्च एंड डेवलपमेंट को छोड़ देंगे, तो हमारे आगे बढ़ने की संभावना उतनी ही क्षीण हो जाएगी। यही हमारे साथ हुआ। आज हमें अपने सामने मौजूद चुनौतियों का सामना करते हुए कार्य करना होगा।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि काला नमक चावल 3,000 वर्ष पहले भगवान बुद्ध का प्रसाद है। भगवान बुद्ध के प्रसाद के रूप में हम इसकी ब्रांडिंग कर रहे हैं। वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट योजना के तहत काला नमक चावल को सिद्धार्थनगर जनपद के प्रोडक्ट के रूप में हमने आगे बढ़ाने का काम किया है। उत्तर प्रदेश में धान की खेती का लगभग 8,000 वर्ष पुराना इतिहास है। इसके प्रमाण मिले हैं। ईसवी सन् 900 से 1200 के बीच में तंजावुर के शिलालेख में उल्लेख मिलता है कि वहां 15 से 18 टन प्रति हेक्टेयर धान का उत्पादन होता था। दक्षिण अर्कोट में 11वीं-12वीं सदी में साढ़े चौदह टन प्रति हेक्टेयर धान का उत्पादन होता था। सन् 1300 से 1325 के बीच रामनाथपुरम, तमिलनाडु के शिलालेख में उल्लेख है कि 20 टन प्रति हेक्टेयर धान पैदा करने की सामर्थ्य वहां की खेती में थी। सन् 1807 में कोयम्बटूर के यूरोपीय ऑब्जर्वर ने लिखा है कि वहां 13 टन प्रति हेक्टेयर धान की उपज होती थी।
सन् 1770 में चेंगलपट्टू में ब्रिटिश ऑब्जर्वर ने लिखा है कि 09 टन प्रति हेक्टेयर धान की उपज वहां होती थी। वर्ष 1993 में पंजाब के लुधियाना में प्रति हेक्टेयर 4.3 टन गेहूं और 5.5 टन प्रति हेक्टेयर धान की उपज एक वर्ष में पैदा होती थी। देश के अलग-अलग क्षेत्रां में अलग-अलग कालखण्ड में यह स्थितियां थीं। 17वीं शताब्दी में फ्रेंकोइस वर्नियर ने बंगाल की खेती के बारे में उल्लेख किया है। उन्होंने कहा है कि दुनिया में मिस्र की खेती को सबसे उत्तम माना गया है। लेकिन वर्नियर ने अपनी दो यात्राओं के माध्यम से कहा कि वास्तव में मिस्र को उत्कृष्ट खेती और कृषि के लिए दिये जाने वाले गौरव का सही हकदार बंगाल रहा है।
19वीं शताब्दी में एक ब्रिटिश ऑब्जर्वर एलेक्जेंडर वाकर ने भी मालाबार के बारे में बातें कही है। उन्होंने कहा है कि मालाबार में कृषि ज्ञान प्रायः उतना ही प्राचीन है, जितना उनका इतिहास है। उनका कहना है कि हिंदू धर्म में उल्लेखनीय अनुष्ठानों में एक का मूल तो सम्भवतः कृषि के प्रति उनके सम्मान से ही है। नंदी की उपासना और गाय के प्रति श्रद्धा का आधार कृषि में इनकी महती उपयोगिता ही है। मालाबार में उस समय 50 से अधिक प्रजातियों के धान उगाए जाते थे। प्रत्येक प्रजाति का अपना पृथक नाम है और उसके अपने विशेष गुण और उसकी खेती की अपनी एक पृथक विधि भी है। कुछ प्रजातियां केवल पहाड़ों में उगती है। उसके लिए सिंचाई की विशेष आवश्यकता नहीं होती। जिस डी0एस0आर0 की बात आज की जा रही है, 100 वर्ष पहले भी इसके बारे में मालाबार में भी यह बात आती है। एक ऐसी भी प्रजाति है, जिसका प्रवर्धन कलम लगा के किया जाता है। ब्रिटिश ऑब्जर्वर ने कहा है कि मालाबार से बाहर उन्होंने धान के प्रवर्धन की इस विधि का उल्लेख कहीं नहीं सुना।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में वर्तमान में 80 प्रतिशत से अधिक भूमि सिंचित है। हमारे यहां अत्यंत उर्वरा भूमि है, सिंचाई और धूप की भी प्रचुरता यहां पर है। वर्ष के 12 माह में से 11 माह हमें बेहतर धूप मिल जाती है। अच्छी बरसात भी होती है। हमारे पास ग्राउण्ड वॉटर भी है और सरफेस वॉटर भी है। हर पांच कोस में यहां एक नदी मिल जाएगी। उत्तर प्रदेश हर प्रकार से धन-धान्य बाहुल्य क्षेत्र है। प्रदेश में दलहनी फसलों और गन्ना तथा आलू सहित सभी प्रकार की फसलों के लिए बहुत उपयोगी भूमि है। उत्तर प्रदेश में लगभग 70 लाख हेक्टेयर भूमि में धान और 100 लाख हेक्टेयर भूमि में गेहूं की खेती होती है। 29 लाख हेक्टेयर भूमि में गन्ना की खेती भी की जाती है। दलहन और तिलहन में भी एक बड़ा क्षेत्रफल प्रदेश में मौजूद है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आजादी के तत्काल बाद उत्तर प्रदेश में वर्ष 1950-51 में कुल 170 लाख हेक्टेयर भूमि खेती-बाड़ी के लिए उपयोग होती थी। जिससे 11.77 मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन होता था। वर्ष 2023-24 में हमारा खेती का रकबा बढ़ा है। यह 170 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 240 लाख हेक्टेयर हुआ है। जिससे वर्तमान में 11 मिलियन टन से बढ़कर 60 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन अकेले उत्तर प्रदेश कर रहा है। वर्ष 1950 की तुलना में वर्ष 2023 में हमने खाद्यान्न उत्पादन में पांच गुना की वृद्धि की है। धान, गेहूं, गन्ना, आलू, दलहन में उड़द, मूंग, अरहर, चना, मटर, मसूर और तिलहन में सरसों, मूंगफली की बेहतरीन खेती उत्तर प्रदेश में हो रही है और इनका अच्छा उत्पादन भी हो रहा है। हमें इस दिशा में आगे लगातार प्रयास करने चाहिए।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आगरा में इण्टरनेशनल पोटैटो सेण्टर शीघ्र संचालित होना चाहिए। यदि आवश्यकता हो, तो कानपुर के चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय के माध्यम से इसे आगे बढ़ाया जा सकता है। तात्कालिक इंफ्रास्ट्रक्चर हम वहां उपलब्ध करवाएंगे। उत्तर प्रदेश सरकार इसमें पूरी मदद करेगी। प्रदेश में अच्छी खेती और क्लाइमेट चेंज की चुनौती का सामना करने के लिए अच्छे बीज चाहिए। हम लखनऊ में 250 एकड़ क्षेत्रफल में पूर्व प्रधानमंत्री स्व0 चौधरी चरण सिंह जी के नाम पर एक सीड पार्क की स्थापना कर रहे हैं। यदि हम मिलकर किसानों को तकनीक दे सकें, उन्हें समय पर अच्छे बीज उपलब्ध करा सके और समय पर उन्हें सभी प्रकार की जानकारियां उपलब्ध करवा सकें, तो उत्तर प्रदेश आज जितना खाद्यान्न का उत्पादन कर रहा है, इससे तीन गुना अधिक उत्पादन कर सकता है। यह सामर्थ्य उत्तर प्रदेश की धरती में है। यदि उत्पादन की क्षमता को बढ़ाएंगे और लागत को कम करेंगे, तो उत्तर प्रदेश वर्ष 2029-30 में 01 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी अवश्य बनेगा। इसमें एग्रीकल्चर की भी बड़ी भूमिका होगी।
मुख्यमंत्री जी ने विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि इरी और सी0आई0पी0 के इण्टरनेशनल सेण्टर की भांति ही अन्य सेण्टर ऑफ एक्सीलेन्स विकसित करके हम अपने अन्नदाता किसानों को बेहतरीन सुविधा उपलब्ध करवाने में मदद कर पाएंगे। फिर कोई कारण नहीं कि उत्तर प्रदेश भारत का फूड बास्केट ना बन जाए। भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक फूड बास्केट के रूप में उत्तर प्रदेश को आगे बढ़ाने में हम पूरा योगदान देंगे।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि प्रधानमंत्री जी ने विगत 27 मई से 12 जून तक भारत के कृषि वैज्ञानिकों से ‘लैब टू लैण्ड’ कार्यक्रम के माध्यम से फील्ड में उतरकर किसानों से जुड़ने का आह्वान किया था। ‘लैब टू लैण्ड’ के कार्यक्रम के साथ हमारे सभी वैज्ञानिक जुड़ेंगे, तो उसके बेहतरीन परिणाम आएंगे। हमारा डेमोन्स्ट्रेशन का आधार हमारी लैब नहीं, बल्कि कृषि भूमि होगी। इससे हम अन्नदाता किसान को अधिक से अधिक फैसिलिटेट कर पाएंगे।
इस अवसर पर कृषि मंत्री श्री सूर्य प्रताप शाही, स्टाम्प, न्यायालय शुल्क एवं पंजीयन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री रवीन्द्र जायसवाल, आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’, कृषि राज्य मंत्री श्री बलदेव सिंह ओलख, प्रमुख सचिव कृषि श्री रवीन्द्र कुमार, इरी की डायरेक्टर जनरल डॉ0 इवोन पिन्टो, भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के संयुक्त सचिव (बीज) श्री अजीत कुमार साहू, श्रीलंका के कृषि सचिव श्री डी0पी0 विक्रमसिंघे, कम्बोडिया के जनरल डायरेक्टरेट ऑफ एग्रीकल्चर डॉ0 कोन्ग किया, वियतनाम अकादमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंस के पूर्व डॉयरेक्टर डॉ0 नुयेन भान वो, सी0आई0पी0 के महानिदेशक डॉ0 साइमन हेक, आइसार्क के निदेशक डॉ0 सुधांशु सिंह, इरी के अनुसंधान निदेशक डॉ0 वीरेन्द्र कुमार तथा कृषि वैज्ञानिक एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।
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